*कलम की अदालत*—-!*
*विश्राम की मौत के लिए आखिर कौन जिम्मेदार?* *मृतक का दुकान मालिक या मंदिर समिति के कथित लोग?*
*मंदिर की घटना, कथित मारपीट और मोबाइल गायब होने के सवालों से गहराया मौत का रहस्य*
दिनेश शर्मा / आष्टा हलचल
आष्टा। किसी की मौत के बाद सबसे आसान काम होता है—कुछ दिन चर्चा करना और फिर सब कुछ भूल जाना। लेकिन जब मौत के पीछे सवालों की लंबी कतार खड़ी हो जाए, तो कलम का काम सिर्फ खबर लिखना नहीं, बल्कि उन सवालों को सामने रखना भी है।
बीती 19 तारीख को छापरी देवकी निवासी युवक विश्राम मेवाड़ा जो की बुधवार स्थित वस्त्रम कपड़े की दुकान पर कार्य करता था ,ने जहरीला पदार्थ खाकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली।
मौत को लेकर प्रारंभिक तौर पर कारण स्पष्ट नहीं है। लेकिन घटनाक्रम से जुड़े कई सवाल ऐसे हैं, जिनके जवाब पुलिस की जांच से सामने आना जरूरी हैं। पुलिस मामले की जाँच करना तो बोल रही हे किंतु आज दिन तक भी पुलिस की जाँच शून्य ही दिखाई दे रही हे पुलिस इस गंभीर मामले में क्यो उदासीनता बरत रही है यह तो वही जाने ,पर आम जनता के दिलो दिमाक में विश्राम की मौत को लेकर अनेकों सवाल अनुत्तरित होकर घूम रहे हे ।
*एक दिन पहले क्या हुआ था?*
मामले में सामने आ रही जानकारी के अनुसार 18 तारीख को मंदिर परिसर में किसी घटनाक्रम को लेकर विवाद हुआ था। इसमें मंदिर समिति से जुड़े कुछ लोगों द्वारा कथित रूप से विश्राम के साथ मारपीट किए जाने और उसका मोबाइल छुड़ाये जाने के आरोप लगाए जा रहे हैं।
दूसरी ओर, वस्त्रम वस्त्रालय परिवार विश्राम को अपने परिवार के सदस्य जैसा बताते हुए इस पूरे घटनाक्रम को उसकी मौत से जोड़कर देख रहा है और मंदिर समिति से जुड़े कुछ कथित लोगों की भूमिका पर सवाल उठा रहा है। उसका यह भी स्पष्ट कहना है कि 18 तारीक को जब मंदिर समिति के लोग मोबाइल छुड़ा कर विश्राम के साथ मारपीट कर रहे थे,तो हम विश्राम को उनके चंगुल से छुड़ा कर दुकान पर ले आए थे,
पर दुकान मालिक के कहे पर शंका होना इस लिए स्वाभाविक नज़र आ रहा है की जब मोबाइल के साथ विश्राम को वस्त्रम वाले दुकान पर ले आए थे तो फिर विश्राम जब 18 तारीख को ही जब अपने गांव गया तो उसे मोबाइल क्यो नहीं दिया? मोबाइल अगले सुबह दुकान दार के भाई ने मंदिर समिति के एक जिम्मेदार व्यक्ति मुकेश बडजात्या को दिया , जिसे मुकेश बडजात्या और उनके साथ अन्य सामाजिक लोग आष्टा थाने ले गये ।
अष्टा थाने की पुलिस का कहना रहा कि इस मोबाइल में ऐसा कोई संदिग्ध डेटा नहीं मिला इसलिए मोबाइल मंदिर समिति के लोगो को ही दे दिया ।
पर यहाँ बड़ा प्रश्न है कि जब मोबाइल में एस कोई डेटा नहीं था तो फिर मोबाइल को समिति लोग क्यो रख कर बैठे रहे जबकि मामले की जाँच करने वाली पार्वती पुलिस मोबाइल की तलाश करती रही ।
ऐसे अनेकों प्रश्न हे जिन्होंने विश्राम की मौत को और अधिक रहस्यमयी बना दिया हे ।
*लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है—*
अगर मोबाइल वास्तव में लिया गया था, तो समिति के लोगो ने लगभग एक सप्ताह तक अपने पास क्यो रखा पार्वती पुलिस को जाँच हेतु क्यो नहीं दिया?
मंदिर के लोगो के पास मोबाइल रखने से स्वतः प्रश्न जन्म ले रहे है की आखिर उस मोबाइल में ऐसी क्या जानकारी थी?
18 तारीख की घटना के दौरान वास्तव में क्या हुआ?
पुलिस ने जाँच पहलुओं में
क्या वहां मौजूद लोगों के बयान लिए ?
क्या घटनास्थल के सीसीटीवी फुटेज खंगाले गए?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या 18 और 19 तारीख की घटनाओं के बीच कोई संबंध था?
इन सवालों के जवाब भावनाओं से नहीं, निष्पक्ष जांच से सामने आने चाहिए।
*पुलिस की जांच पर भी सवाल*
मौत के मामले में पुलिस की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। लेकिन यदि मृतक की मौत से पहले हुए घटनाक्रम को लेकर परिवार या संबंधित लोग गंभीर आरोप और संदेह व्यक्त कर रहे हैं, तो हर कड़ी की जांच होना स्वाभाविक अपेक्षा है।
मोबाइल की बरामदगी, कॉल डिटेल, घटनास्थल के सीसीटीवी, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, विसरा रिपोर्ट तथा 18 तारीख की कथित घटना—ये सभी जांच के महत्वपूर्ण हिस्से हो सकते हैं।
यदि इन सवालों के जवाब जांच में मिलते हैं तो तस्वीर साफ होगी। और यदि कोई व्यक्ति दोषी नहीं है तो निष्पक्ष जांच उसके लिए भी उतनी ही जरूरी है, जितनी मृतक के परिवार के लिए।
*कलम की अदालत में कटघरे में कौन?*
यह अदालत कोई फैसला सुनाने नहीं बैठी है।
यहां न मंदिर समिति को दोषी घोषित किया जा रहा है, न वस्त्रम परिवार के आरोपों को अंतिम सत्य माना जा रहा है और न पुलिस को किसी अपराध का दोषी ठहराया जा रहा है।
लेकिन सवाल पूछना तो बनता है।की एक युवक दुनिया छोड़ गया।
उसके परिवार के पास अब सिर्फ यादें हैं।
*और समाज के पास सवाल—*
क्या विश्राम ने वास्तव में अज्ञात कारणों से आत्महत्या की?
या उसकी मौत से पहले घटित घटनाओं में कोई ऐसी कड़ी थी, जिसे जांच की रोशनी में लाना जरूरी है?
*मोबाइल… आखिर मोबाइल में ऐसा क्या था?*
इस पूरे मामले में मोबाइल सबसे अहम कड़ी बनकर सामने आ रहा है—ऐसा संबंधित लोगों द्वारा कहा जा रहा है।
अगर मोबाइल किसी घटनाक्रम के बाद गायब हुआ, तो उसकी बरामदगी और तकनीकी जांच से महत्वपूर्ण हो सकती है। मोबाइल में मौजूद कॉल लॉग, संदेश और अन्य डिजिटल साक्ष्य घटनाक्रम की वास्तविकता समझने में मदद कर सकते हैं।
लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि किसी डिजिटल सामग्री को जांच के बिना सार्वजनिक निष्कर्ष का आधार न बनाया जाए।
*पुलिस के लिए भी यह सिर्फ एक मर्ग नहीं*——
किसी युवा की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत को सिर्फ मर्ग की औपचारिकता तक सीमित करने के बजाय उससे जुड़े प्रत्येक तथ्य की जांच करना जरूरी है।
मृतक के अंतिम समय के संपर्क, 18 तारीख का घटनाक्रम, कथित मारपीट, मोबाइल का गायब होना/बरामदगी, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और उपलब्ध इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य—इन सबकी निष्पक्ष जांच ही परिवार और समाज के संदेह दूर कर सकती है।
क्योंकि…
मौत बोलती नहीं,
लेकिन मौत से पहले के घटनाक्रम बहुत कुछ बोल सकते हैं।
और अगर पुलिस की जांच उन आवाजों को सुन ले, तो शायद विश्राम की मौत से जुड़े सवालों का जवाब मिल सके।
*कलम की अदालत का अंतिम सवाल*
विश्राम की मौत के लिए आखिर कौन जिम्मेदार है?
इसका जवाब कलम नहीं, जांच देगी।
लेकिन जांच अगर सवालों तक पहुंचने से पहले ही रुक गई,
तो सवाल पूछने वालों की संख्या बढ़ती जाएगी।
क्योंकि किसी की मौत पर पर्दा डालना आसान हो सकता है,
लेकिन सवालों पर पर्दा डालना हमेशा आसान नहीं होता।
*आष्टा हलचल की मांग:
मामले की निष्पक्ष, तथ्याधारित और सभी संबंधित पक्षों को सुनकर जांच हो तथा मृतक के मोबाइल और 18 तारीख के कथित घटनाक्रम की भी जांच के दायरे में स्पष्ट रूप से समीक्षा की जाए।
*विश्राम का समाज है आक्रोशित*
इस पूरे घटित घटना क्रम से असंतुष्ट विश्राम का मेवाड़ा समाज में काफ़ी आक्रोश हे,








